ऋषि पंचमी 2026: शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत नियम

15 सितंबर 2026, मंगलवार को ऋषि पंचमी है। जानिए मध्याह्न पूजा का समय, तिथि का पूरा विवरण और व्रत कैसे रखा जाता है।

UPDATED 2026-09-266 MIN READ
नदी किनारे सुबह की धूप में एक महिला सात दीपकों के सामने हाथ जोड़कर सप्तऋषियों का ध्यान करती हुई

ऋषि पंचमी 2026 मंगलवार, 15 सितंबर 2026 को है। इस दिन मध्याह्न पूजा मुहूर्त सुबह 11:02 बजे से दोपहर 1:30 बजे तक (2 घंटे 28 मिनट) रहेगा। भाद्रपद शुक्ल पंचमी तिथि सुबह 7:44 बजे, 15 सितंबर 2026 से सुबह 8:59 बजे, 16 सितंबर 2026 तक है। समय नई दिल्ली (IST) के हैं।

KEY TAKEAWAYS
  • ऋषि पंचमी का व्रत मंगलवार, 15 सितंबर 2026 को रखा जाएगा।
  • पूजा के लिए मध्याह्न मुहूर्त सुबह 11:02 बजे से दोपहर 1:30 बजे तक है।
  • पंचमी तिथि दोपहर के समय 15 सितंबर को ही रहती है, इसलिए यही दिन मान्य है।
  • राहु काल दोपहर 3:21 बजे से शाम 4:54 बजे तक है, जिसे पूजा के लिए टालना अच्छा माना जाता है।

ऋषि पंचमी 2026 किस दिन है और यही दिन क्यों?

ऋषि पंचमी भाद्रपद शुक्ल पंचमी को मनाई जाती है और 2026 में यह मंगलवार, 15 सितंबर 2026 को है। सभी समय नई दिल्ली के लिए (IST) हैं, अन्य शहरों में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है। पंचमी तिथि सुबह 7:44 बजे, 15 सितंबर 2026 को आरंभ होकर सुबह 8:59 बजे, 16 सितंबर 2026 को समाप्त होगी। 15 सितंबर को सूर्योदय के समय चतुर्थी (सुबह 7:45 बजे तक) रहती है, फिर भी व्रत इसी दिन होगा, क्योंकि ऋषि पंचमी की पूजा मध्याह्न में होती है और उस समय पंचमी तिथि 15 सितंबर को ही व्याप्त है। 16 सितंबर को पंचमी सुबह ही समाप्त हो जाती है।

ऋषि पंचमी की पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है?

मध्याह्न पूजा मुहूर्त सुबह 11:02 बजे से दोपहर 1:30 बजे तक (2 घंटे 28 मिनट), 15 सितंबर 2026 है। यही इस पर्व की मुख्य अवधि है। इसके भीतर अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:52 बजे से दोपहर 12:41 बजे तक (49 मिनट) भी आता है। राहु काल दोपहर 3:21 बजे से शाम 4:54 बजे तक (1 घंटे 33 मिनट) है, जो पूजा मुहूर्त के बाद पड़ता है।

15 सितंबर 2026 का पंचांग कैसा है?

सूर्योदय: सुबह 6:06 बजे। सूर्यास्त: शाम 6:27 बजे। चंद्रोदय: सुबह 10:00 बजे। नक्षत्र: स्वाति (दोपहर 3:21 बजे, 15 सितंबर 2026 तक)। योग: इन्द्र (दोपहर 12:20 बजे, 15 सितंबर 2026 तक)। करण: विष्टि (सुबह 7:45 बजे, 15 सितंबर 2026 तक)। चंद्रमा तुला राशि में और सूर्य सिंह राशि में हैं। विष्टि करण सुबह जल्दी समाप्त हो जाता है, इसलिए मध्याह्न पूजा पर इसका असर नहीं पड़ता।

ऋषि पंचमी का व्रत क्यों रखा जाता है?

यह दिन सप्तऋषियों, यानी कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ के प्रति कृतज्ञता का पर्व माना जाता है। परंपरा में इसे मुख्य रूप से स्त्रियों का व्रत माना गया है, जो जाने-अनजाने हुई भूलों के प्रायश्चित और आत्मशुद्धि के भाव से रखा जाता है। इससे जुड़ी कथा एक ब्राह्मण परिवार की है, जिसे अलग-अलग रूपों में सुनाया जाता है। यह हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी के बाद आता है।

ऋषि पंचमी की पूजा कैसे की जाती है?

सामान्य रूप से प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लिया जाता है और मध्याह्न मुहूर्त में सप्तऋषियों की पूजा की जाती है। कई घरों में चौकी पर सात ऋषियों का प्रतीक स्थापित कर दीप, पुष्प, अक्षत और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं और व्रत कथा सुनी जाती है। स्नान की विशेष विधि, पूजा सामग्री और मंत्र परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग होते हैं, इसलिए अपने घर की परंपरा या कुल पुरोहित की सलाह मानना उचित है।

व्रत में क्या खाएं और किन बातों से बचें?

व्रत में भोजन से जुड़े नियम हर क्षेत्र और परिवार में एक जैसे नहीं हैं। कुछ लोग पूरे दिन निराहार रहते हैं, तो कुछ फलाहार या सीमित सात्विक भोजन लेते हैं। अपनी सेहत के अनुसार ही व्रत का स्वरूप चुनें और गर्भावस्था या किसी बीमारी में डॉक्टर की सलाह लें। पूजा को मध्याह्न मुहूर्त में रखना और राहु काल (दोपहर 3:21 बजे से शाम 4:54 बजे तक) में नए शुभ कार्य न करना अच्छा माना जाता है। मुहूर्त पूरे शहर के लिए एक ही होता है, पर कोई अवधि आपको व्यक्तिगत रूप से कैसे प्रभावित करती है, यह आपकी कुंडली पर निर्भर करता है, जिसे Melooha देख सकता है।

CLASSICAL SOURCES
  • Swiss Ephemeris (planetary data)
  • Lahiri ayanamsa
  • Nirnaya Sindhu
  • Bhavishya Purana

Frequently Asked Questions

ऋषि पंचमी मंगलवार, 15 सितंबर 2026 को है।

इस पर्व की पूजा मध्याह्न में होती है। पंचमी सुबह 7:44 बजे, 15 सितंबर 2026 से शुरू हो जाती है और दोपहर में व्याप्त रहती है, जबकि 16 सितंबर को यह सुबह 8:59 बजे समाप्त हो जाती है।

मध्याह्न पूजा मुहूर्त सुबह 11:02 बजे से दोपहर 1:30 बजे तक (2 घंटे 28 मिनट) है। अपने शहर का सटीक समय स्थानीय पंचांग से देखें।

परंपरा में यह मुख्य रूप से स्त्रियों का व्रत माना जाता है, पर कई जगह पुरुष भी सप्तऋषियों की पूजा करते हैं। यह परिवार और क्षेत्र की परंपरा पर निर्भर है।

Melooha Astrology Team
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